
शहर में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोगों की कमी नहीं थी। चौराहों से लेकर सोशल मीडिया तक हर कोई व्यवस्था को7 कोसता था।
सबसे आगे थे शर्मा जी।
वे हर सभा में कहते, “देश का सत्यानाश भ्रष्ट अफसरों ने कर दिया है।
अब क्रांति लानी होगी!”
एक दिन उनके बेटे का लाइसेंस अटक गया। दफ़्तर में एक दलाल ने कहा, “थोड़े पैसे दे दीजिए, काम आज ही हो जाएगा।”
शर्माजी ने पहले तो भ्रष्टाचार पर लंबा भाषण दिया, फिर चुपचाप दलाल की जेब में पैसे सरका दिए। शाम को लौटकर फिर वही पुराना भाषण शुरू हो गया।
उसी दफ़्तर में खड़ी एक वृद्ध महिला ने यह सब देखा। वह बोली, “बेटा, भ्रष्टाचार केवल लेने वाला नहीं बढ़ाता, देने वाला भी उतना ही दोषी होता है।”
शर्मा जी के पास कोई उत्तर नहीं था। पहली बार उन्हें अपनी ही आवाज़ खोखली लगी।
तभी खड़ी वृद्ध महिला बेली,
“भ्रष्टाचार भाषणों से नहीं, अपने छोटे-छोटे ईमानदार निर्णयों से हारता है;
गरजने वाले बरसते नहीं।”
अनीता सिद्धि
पटना बिहार।




