
निज कर्मों के हाथ में सब,चाहे पुण्य कमा चाहे पाप।
किसी को अगर सताओगे,तो झेलना उसका संताप।।
बहते आँसू मजबूरों के,प्रभु देख रहे दुनिया का बाप।
सुखी नहीं रह सकते कभी,भोगोगे जीवन का श्राप।।
सूखी रोटियाँ खाकर अपने,पेट न जाने कितने भरते।
गरीबी की पीड़ा एवं आग में,निर्धन हरदम हैं जलते।।
समाज में सक्षम जन उनकी,सेवा में कुछ लोग रहते।
बाकी तो बस केवल उनको,बेघर करने में ही मरते।।
पुण्य कमाना सबके वश की,बात नहीं होती है यारों।
कुछ जो करना और कमाना,चाहें ताना तो न मारो।।
नर तन जन्म दिया है प्रभु तो,कुछ सोच दिया प्यारों।
मरते को मत मारो भइया,मरतों को और मत मारो।।
पेड़ों में फल लगते जैसे ये,सारी डाली झुक जाती हैं।
राहगीर भी कुछ फल खाएँ,शुचि सोच वृक्ष लगाती।।
पेड़ों से छाया भी पाएँ,थोड़ा सुस्ताएं आत्मा जगाती।
राही भी खा लेंगे तो क्या होगा,दुनिया तो है खाती।।
इतनी सुंदर सामाजिक सोच,बताए व्यक्ति पुण्यात्मा।
धर्म कर्म निर्मल मन प्रभुभक्त,होता वह है धर्मात्मा।।
वही कमाता पुण्य हमेशा,उसी से तृप्त होती आत्मा।
यही तो जाएगा मनुज संग,प्रसन्न होते हैं परमात्मा।।
लूट मार छिनौती कब्जा हत्या,करता यही पापात्मा।
बुरे कर्मों से सबको तड़पाता,उसकी न रोए आत्मा।।
पापी केवल पाप कमाता,बन न सके वह दिव्यात्मा।
सभी अपने कर्मों का फल पाते,भोगी है जीवात्मा।।
पुण्य-पाप लेखा-जोखा,रखते श्रीचित्रगुप्त महात्मा।
सब पर नजर विधाता की,वो परमपिता परमात्मा।।
चाहे पुण्य कमाएँ भइया,चाहे पाप कमाओ भइया।
स्वर्ग नर्क सब इसी धरा पर,संग जाए नहीं रुपैया।।
कोठी महल अटारी,सोना-चांदी हीरा-मोती भइया।
अभी से करले तौबा शायद,पार उतर जाए नईया।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.




