साहित्य

जून की रोटी

ममता झा मेधा 

  • #शीर्षक_दो_जून_की_रोटी

ना महल चाहिए, ना कोई ताज चाहिए
मुझे तो बस, दो जून की रोटी पर नाज़ चाहिए

सुबह से शाम तक, पसीना बहाता हूँ
रिक्शा खींचता हूँ, ईंटें उठाता हूँ
धूप तपे या बारिश, रुकता नहीं कारवाँ
क्योंकि चूल्हा बुझे तो, रो देंगे मेरे भगवान

बच्चों की थाली में, जब रोटी दिखती है
थकान सारी मेरी, तभी तो मिटती है
बाबूजी की दवाई, माँ की मुस्कान
दो जून की रोटी में, बसा है जहान

कभी सूखी मिले, कभी नमक संग खाई
फिर भी शुक्र मनाऊँ, किस्मत पे हरजाई
अमीरों की दावत से, मीठी ये लगती है
क्योंकि मेहनत की कमाई, दिल को भाती है

ऐ खुदा इतनी रहमत, बनाए रखना
मेरे बच्चों के हिस्से की, रोटी बचाए रखना
ना धन दौलत माँगूँ, ना कोई राज चाहिए
बस दो वक्त की रोटी, और सर पर साज चाहिए

*”दो जून की रोटी” सिर्फ खाना नहीं है,
ये इज्जत है, ये जिद है, ये एक बाप का सपना है।
ये हर उस इंसान की कहानी है जो ईमान से कमाता है”।

ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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