साहित्य

सड़क किनारे सपने

दिनेश पाल सिंह

परिवार के बड़े बेटे की मार्मिक कविता)

नंगे पाँव धूप नापी थी,

घर की ख़ातिर उम्र गँवाई थी।

अपने हिस्से की हर खुशहाली

सबकी झोली में पहुँचाई थी।

 

माँ की दवा, पिता का चश्मा,

बहनों की मुस्कान खरीदी।

भाइयों की हर छोटी ज़िद भी

अपने अरमान बेचकर सींची।

 

किसे पता था एक दिन

अपनों की चौखट ही परायी होगी,

जिस आँगन में हँसी बोई थी,

वहीं आँखों की फसल उगाई होगी।

 

कुछ चेहरे मीठे बोलों वाले,

घर के भीतर राज करने लगे।

सच्चे रिश्ते हार गए,

चापलूस ताज पहनने लगे।

 

फिर एक दिन फ़ैसला आया-

“अब तेरा यहाँ क्या काम?”

जिस बेटे ने घर को मंदिर माना,

उसी पर लग गए इल्ज़ाम।

 

वह चुपचाप निकल आया,

पीठ पर कोई बोझ नहीं था।

बस टूटे विश्वास का पत्थर

सीने में रखा हुआ था।

 

उसने कहा,

“रोटी मेहनत से कमाऊँगा,

भूखा रह लूँगा,

पर झूठ के आगे

सर नहीं झुकाऊँगा।“

 

मगर नफ़रत अभी अधूरी थी।

रास्ता भी उनसे देखा न गया।

जिन हाथों ने उन्हें संभाला,

उसी हाथ पर वार किया गया।

 

सीधा हाथ टूट गया,

रोटी कमाने का सहारा छूट गया।

एक आदमी नहीं टूटा,

पूरा जीवन बिखर गया।

 

आज वही बेटा

फुटपाथ की धूल में बैठा है।

कोई उसे भिखारी कह देता है,

कोई नज़रें फेरकर निकल जाता है।

 

कौन बताए उन्हें,

कटोरा उसकी पहचान नहीं,

यह तो मजबूरी का आईना है,

जिसमें समाज का चेहरा दिखता है।

 

रात को जब तारे जगते हैं,

वह चुपके से ईश्वर से कहता है,

“मुझे महल नहीं चाहिए प्रभु,

बस इतना कर देना,

किसी बेटे को

अपने ही घर में पराया मत होने देना।”

 

क्योंकि सड़क किनारे

सिर्फ़ आदमी नहीं सोते,

वहाँ सपने भी

ठंडी ज़मीन पर दम तोड़ते हैं।

 

और इतिहास गवाह है-

जिस घर में त्याग का अपमान होता है,

वहाँ सुख ज़्यादा दिनों तक

मेहमान नहीं रहता।

 

कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

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