
सुभद्रा और बलभद्र संग, प्रभु पुरी में रथ पर आते हैं,
हर्षित होकर भक्त प्रेम से, जय जगन्नाथ गुनगुनाते हैं।
पावन डोरी थामते ही सारे, जग के बंधनों से मुक्ति पाएँ,
तीनों लोकों के स्वामी को, हम सब मिलकर शीश नवाएँ।
नीलाचल के नाथ विराजे, जग को पार लगाने को,
छोड़ के अपना भव्य मंदिर, आते हैं भक्तों को अपनाने को।
हिलोरें लेती है भक्ति की धारा, पुरी की पावन गलियों में,
आनंदित हो उठा है जन-मन, इस रथ यात्रा की घड़ियों में।
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश
( स्वरचित)




