साहित्य

सनातन की शाश्वत ज्योति

संगीता वर्मा

जिसका आदि न अंत कोई, वो अनादि विचार है।

कण-कण में बसा ईश्वर, सनातन जिसका आधार है।

ऋषियों की तपोभूमि पर, वेदों का जो ज्ञान है,

मानवता के कल्याण को, समर्पित जो वरदान है।

 

ना कोई इसका आरंभ है, ना ही कोई छोर है,

यह सत्य, प्रेम और अहिंसा का अटूट भोर है।

राम की मर्यादा, कृष्ण का गीता में सार है,

सब प्राणियों में जो देखे, वो पावन संस्कार है।

 

बदलते युग और मौसम, कई तूफ़ान आए यहाँ,

पर डिगा न जो कभी, वो अडिग हिमालय सा यहाँ।

वसुधैव कुटुंबकम् का पाठ जिसने पढ़ाया है,

हर युग में धर्म का ध्वज, जिसने लहराया है।

 

त्याग, तपस्या और बलिदान, इसकी पहचान है,

जीव मात्र की सेवा ही, इसका मूल ज्ञान है।

यह संस्कृति नहीं केवल, यह जीवन का सार है,

सनातन ही तो इस भारत की पहचान अपार है।

 

*© मौलिक, स्वरचित*

संगीता वर्म,कनपुर उत्तर प्रदेश

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