साहित्य

स्याही की कोई सीमा नहीं

सौ, भावना

जज्बातों की कलम में,

दर्द की स्याही को भरकर।

मन के आकाश में लिखती हूं,

अपने शब्दों को पिरोकर।

 

स्याही की कोई सीमा नहीं,

कल्पनाओं के परे चली जाती है।

कभी एक पल में हंसाती है,

और अगले ही पल रुला जाती है।

 

कभी दर्द बनकर दिल में बहती,

कभी मेरे सपनों में है रंग भरती।

कभी खामोशी की आवाज बन जाती,

टूटता हुआ देखकर मुझे संभालती।

 

समय रिश्ते कलम को बांध ना पाएं,

भावनाओं के आकाश में उड़ती जाए।

मेरी अनकही कहानी सबको बताती,

सुख दुख में हर पल साथ निभाती।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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