साहित्य

कुछ कहना है

वीणा गुप्त 

तमस पटल पर खींचे,

आओ, उजली एक लकीर।

विजय- गान आशा का हो ले।

2

कुछ न छिपाएं,

सब कुछ कह दें।

रिश्ते नेह लबालब हो लें।

3

दादी खटिया,बाबा मढैया,

अंगना खेलें दाऊ- कन्हैया,

काश यह सपना फिर सच हो ले।

4

वासना,तांडव कर रही

टूटीं सब मर्याद,

शिव अब नेत्र तीसरा खोलें।

5

भाषा, राज्य,धर्म- जाति पर,

काटो नहीं बवाल।

देश प्रेम लज्जित न हो ले।

6

हिंसा अधर्म विद्वेष से,

हुआ जगत  बेहाल,

आओ प्रीत की फसल उगो ले।

7

बिना खिले मुरझाया बचपन ,

पहन रहा चिथड़ों की उतरन,

आओ उसे गोद में ले लें।

8

सत्यमेव जयते की होती,

आज करारी हार।

आओ पोल झूठ की खोलें।

9

दीख रही कोंपल नई,

ठूंठ ले रहा साँस।

आगाज़ जंगल का हो ले।

 

10

मिली भगत ने लुढ़का दिया,

सारा ही बाजार,

नक्कारे में क्या  तूती बोले।

 

11

पैदा अयोग्यता के हुए,

बहुतेरे माई- बाप।

प्रतिभा की हेठी न हो ले।

12

अंधा सावन का हुआ,

हरियाली रही सूझ।

कैसे पतझर बिथा टटोले।

13

ताम- झाम की चकाचौंध में,

हुआ लुप्त भगवान।

अंतस में अब उसे टटोले।

 

14

अनय समक्ष यदि मौन धरा तो,

महाभारत तो होना ही है।

उठ पाँचाली केश संजो ले।

 

15

 

ठूंठ हुआ है उपवन सारा,

बहारों ने बेरुखी दिखाई,

आओ राग मल्हार को छेड़े।

 

16

 

सुबह का भूला घर आया है,

अपनी गलती पर पछताता,

आओ उसकी लाज समो ले।

 

17

पनपे पले देश माटी में,

फल अब बिके विदेश।

अब कैसे ऋण चुकता हो ले।

 

18

 

समझ विनय को भीरुता,

सिंधु रहा इठलाय।

अग्नि बाण अब रघुवर छोड़े।

 

19

लांध मरजादा रेख सब,

करे शिशुपाल प्रलाप,

चक्र सुदर्शन कैसे सह ले।

 

20

देखो परखो गौर से,

सोचो सही निदान।

हवा हवाई मुश्किल हो ले।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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