
अनहद नाद निनाद (मुक्तामणि छंद)
उदित भानु भास्कर भुवन,
नित दिन करे उजाला।
प्रात पवन प्रमुदित प्रखर,
लगता है मतवाला॥
पंछी पिंजड़ा छोड़ के,
ढ़ूँढ़े नित्य निवाला।
भक्ति भाव में लीन हैं,
सज्जन सभी शिवाला॥
महादेव इस लोक के,
पालक हैं रखवाला।
अनहद नाद निनाद से,
त्रिभुवन सदा सँभाला॥
ध्यान मग्न होकर शिवा,
नित्य जपे हैं माला।
अंग भभूती डालते,
तन पर है मृगछाला।
संग सदा गौरा रहें,
गणपति गोद विराजें।
कार्तिकेय भी संग में,
शिव कुटुंब में साजें॥
भाल चंद्रमा सोहता,
शिखर शोभती गंगा।
ग्रीवा में सोहे सदा,
विषधर व्याल भुजंगा॥
ब्रह्मा विष्णु के संग शिव,
त्रयीदेव कहलाते।
संचालन संसार का,
सम्यक भाव चलाते॥
माहेश्वर वह सूत्र है,
चौदह ध्वनि सुजाना।
शिव के डमरू नाद से,
निकला तब जग जाना॥
© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




