साहित्य

भोले का सावन

कार्तिकेय कुमार

इधर-उधर क्यूं जाते भोले,

पास मेरे तुम आओ ना,

सावन की ये बेला आई,

आकर तुम मुस्काओ ना।

इधर-उधर क्यूं …

झूम- झूमकर बादल आया,

धरा होले से फिर मुस्काई,

अंबुआ के पेड़ों पर देखो,

झूलों ने फिर ली अंगड़ाई।

इधर-उधर क्यूं …

बेल की डाली का पत्ता भी,

क्या-क्या है मुझसे बोला,

भोले से जब मिलकर आया,

प्रेम का रस उसने घोला।

इधर-उधर क्यूं …

मोंगर और केवड़ नें अपनी,

खुशबू चहुं और बिखराई,

भोले ने आकर फिर सबको,

अपनी मोहक छवि दिखलाई।

इधर-उधर क्यूं …

सावन होता है मनभावन,

भोले भक्ति से मन हो पावन,

जगर-मगर हो जाए जीवन,

जब आए भोले का सावन।

इधर-उधर क्यूं….

(277/335वां मनका)

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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’

सी.स्पेशल, गांधी नगर, इन्दौर

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