
इधर-उधर क्यूं जाते भोले,
पास मेरे तुम आओ ना,
सावन की ये बेला आई,
आकर तुम मुस्काओ ना।
इधर-उधर क्यूं …
झूम- झूमकर बादल आया,
धरा होले से फिर मुस्काई,
अंबुआ के पेड़ों पर देखो,
झूलों ने फिर ली अंगड़ाई।
इधर-उधर क्यूं …
बेल की डाली का पत्ता भी,
क्या-क्या है मुझसे बोला,
भोले से जब मिलकर आया,
प्रेम का रस उसने घोला।
इधर-उधर क्यूं …
मोंगर और केवड़ नें अपनी,
खुशबू चहुं और बिखराई,
भोले ने आकर फिर सबको,
अपनी मोहक छवि दिखलाई।
इधर-उधर क्यूं …
सावन होता है मनभावन,
भोले भक्ति से मन हो पावन,
जगर-मगर हो जाए जीवन,
जब आए भोले का सावन।
इधर-उधर क्यूं….
(277/335वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
सी.स्पेशल, गांधी नगर, इन्दौर




