
घिर-घिर आए मेघ गगन में, छाई श्याम घटा,
हरित धरा के अंग-अंग पर, छाई नव लता।
रिमझिम बूँदें मोती बनकर, झरती अविराम,
भीगे पथ वन उपवन सारे, जपते प्रिय नाम।
अमराई में कोयल कूके, मधुरिम स्वर धार,
पुरवैया के संग बहकता, मन का हर तार।
झूले पड़ते नीम डाल पर, गातीं सब सखियाँ,
सावन की मादक बेला में, खिलती है कलियाँ।
नदिया का उन्मुक्त सलिल भी, गाए नव गान,
खेतों में लहराए धानी, सपनों का धान।
विरहन नयनों में सजती है, मिलनासक्त प्यास,
बादल संग रहती, प्रियतम की आस।
तन ही नहीं मन भी भीगा, बरसे ऐसा नेह,
सावन लाया संग धरा पर, प्रेमिल संदेश।।
पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद



