साहित्य

अंतर्द्वंद्व

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

लगती है आग कलेजे में,तूफान तभी तो उठता है,
खोटी खरी बात सुनता जब,क्रोध तभी तो उमड़ता है,
क्या कर डालूं,कट जाएं शूल, राह सरल हो जाए,
भुजा फड़कने लगती हैं,मन कहां किसी को सुनता है।।

बेवजह कहां कोई भिड़ता है,अस्मत पे आए टूट पड़ो,
स्व को कभी न झुकने देना,जा सम्मुख उसके खूब लड़ो,
प्रतिकार का मौका मत देना,दहकी ज्वाला को जलने दो,
सच्चाई और विवेक को रख के, चक्कर में किसी के नहीं पड़ो।।

जीवन एक तपस्या है, खुद ही रक्षक इसका बनना,
राम लखन न मिल पाएंगे,मठ की रक्षा खुद का करना,
परोपकार में खोना पड़ता,नहीं अधिक तो शांति स्वयं की,
लांक्षन और प्रतिवाद झेलना, दुश्मन अपनों का बनना।।

चलते रहो थको मत खुद से, मंजिल जब तक मिल न जाए,
चलते रहना ही जीवन है,बिन चले,पुरुषार्थ न खिल पाए,
मन में उठी जो ज्वाला थी, प्रेरणा स्वरूप वो दहक रही,
सेवा त्याग समर्पण से दुश्मन खुद से मिल जाए।।

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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