
सुकुन को ढुंढने घर से निकला हूं
हर मोड़ पे खोज लेना है उन्हें
कब तक हमसे भागते रहोगे
एक दिन पाकर ही दम लेगें जिसे
जहाँ छुपना है छुप कर देख लेना
बहुत सताया है ये जालिम जमाना
मन बोझिल हो बैठा हूँ तन मन से
शांति सुकून पाकर है दिखलाना
शंति चैन की बात करो अब कोई
क्यूं बैचेनी की बोझ काँधे पे ढ़ोऊँ
नहीं चाहिये क्रोध में अब उग्रता
सुविचार में जी कर सुकुन पाऊँ
ढुँढ कर ही आज चैन से बैठुगाँ
कब तक भागते फिरोगे आप
बाँध कर तुम्हें घर मैं ले आऊँगा
मिटा देगें तब किस्मत की शाप
चाहे पैर में ठोकर दर्द दे जाये
चाहे काँटा चुभ कर दे लहू लुहान
रोक ना पायेगी मन की चाहत
जीवन में आयेगी अब नई विहान
ढुँढने वाले ढुँढ ही लेते हैं मंजिल
मन में जब दृढ़ इच्छा हो जाग्रत
मिलने वाले मिल ही जाते हैं तब
जब हो चलने वाले मन से उद्दत
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार



