
कुछ देर पहले मैंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखा।
एक ट्रेन के डिब्बे में, सार्वजनिक सीट पर, एक युवक और एक युवती खुलेआम अशोभनीय हरकतों में लिप्त थे।
कोई पर्दा नहीं।
कोई संकोच नहीं।
कोई यह स्मरण नहीं कि यह स्थान निजी शयनकक्ष नहीं, बल्कि समाज का साझा परिसर है।
मैं वह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गई।
दुखी हुई।
अपमानित हुई — एक स्त्री, एक नागरिक और एक सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी लेखिका होने के नाते।
यह केवल दो व्यक्तियों का नैतिक विचलन नहीं था —
यह उस गिरती हुई सीमा रेखा का दृश्य था
जहाँ “निजी स्वतंत्रता” के नाम पर
“सार्वजनिक मर्यादा” का गला घोंटा जा रहा है।
आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ
अश्लीलता को बोल्डनेस कहा जाता है,
लज्जा को दकियानूसी,
और संयम को दमन।
टीवी, वेब सीरीज़, रियलिटी शो और सोशल मीडिया
लगातार एक ही संदेश दे रहे हैं —
“सब दिखाओ, सब बेचो, सब भुनाओ।”
लड़ाई, अपमान, यौन-उत्तेजना, संबंधों की अश्लील नुमाइश —
इन्हें मनोरंजन के नाम पर
हर घर के ड्राइंग रूम में परोसा जा रहा है।
और बच्चे?
वे यही सीख रहे हैं कि
मर्यादा कोई मूल्य नहीं,
संयम कोई गुण नहीं।
पर सवाल यह नहीं है कि लोग भटक क्यों रहे हैं।
सवाल यह है कि
भटकाव को ग्लैमर क्यों बनाया जा रहा है?
जब बाजार को केवल मुनाफा दिखता है,
और सत्ता को केवल राजस्व,
तब संस्कृति, नैतिकता और सामाजिक संतुलन
अनाथ हो जाते हैं।
सूचना और प्रसारण की संस्थाएँ
रेटिंग और विज्ञापन के आगे
अपने कर्तव्य भूल चुकी हैं।
यह सिर्फ “एक शो” या “एक वीडियो” नहीं है —
यह आने वाली पीढ़ी के मन का निर्माण है।
और जब समाज का मन
कामुकता, आक्रामकता और भोग में डूबता है,
तो वहाँ संवेदना, करुणा और रिश्ते
धीरे-धीरे मर जाते हैं।
मैं आधुनिकता के विरुद्ध नहीं हूँ।
मैं स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं हूँ।
लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ
सार्वजनिक मर्यादा का अपमान नहीं हो सकता।
सभ्यता वही होती है
जो अपनी इच्छाओं को
समाज की सीमाओं के भीतर रख सके।
अगर ट्रेन का डिब्बा, स्कूल का मोबाइल,
और घर का टीवी
सब कुछ ही निजी वासना का मंच बन जाए —
तो आने वाली पीढ़ी
सभ्य नागरिक नहीं,
उत्तेजित उपभोक्ता बनकर ही बचेगी।
यह लेख किसी के खिलाफ नहीं है —
यह हमारी सामूहिक चेतना के पक्ष में है।
क्योंकि
संस्कृति जब टूटती है
तो आवाज़ नहीं करती,
बस पीढ़ियाँ खो जाती हैं।
*दया भट्ट खटीमा उधम सिंह नगर (उत्तराखंड*)




