साहित्य

घायल रूहों की मुझको

शायर देव मेहरानियाँ

घायल रूहों की मुझको,चित्कार सुनाई देती है।
उठे जहाँ भी नजर वहाँ,एक लाश दिखाई देती है।।

सता के दरवाजे पर ही,लुटने लगी बेटियाँ अब ।
लुटी आबरू,जीन कैसा,मरने लगी बेटियाँ अब।
सत्ता के रखवालों सुन लो,घड़ा पाप का फूटेगा,
जाग चुकी आवाम यहाँ,ललकार सुनाई देती है।
घायल रूहों की मुझको,चित्कार सुनाई देती है।।

सरहद का पहरेदार कोई ,कब लिपट तिरंगे में जाए।
चित्कार उठें घर की दीवारें,मातम ऐसा छा जाए।।
सिसक पड़े सिंदूर माँगा का,राखी भी छुपकर रोए,
टूट चुकी उस पायल की, झनकार सुनाई देती है।
घायल रूहों की मुझको,चित्कार सुनाई देती है।।

सत्ता के मद में होके ,अब लगे हैं करने मनमानी।
भूल गए मर्यादा सारी,अत्याचारी अभिमानी।।
बन बैठे हैं खुद ये मालिक,तुमको दास बनाएंगे,
शंबूक की गर्दन पर फिर तलवार दिखाई देती है।
घायल रूहों की मुझको,चित्कार सुनाई देती है।।

जुगनू बनकर मैं सूरज की किरणों से अङ जाऊँगा।
बेबस_मजलूमों की खातिर, सत्ता से लड़ जाऊँगा।।
मत सोचो डर जाऊँगा इन गोली की बौछारें से,
अंधी- बहरी मुझको ये सरकार दिखाई देती है।
घायल रूहों की मुझको,चित्कार सुनाई देती है।।

घायल रूहों की मुझको,चित्कार सुनाई देती है ।
उठे जहाँ भी नजर वहाँ,एक लाश दिखाई देती है।

✍️ शायर देव मेहरानियाँ_ राजस्थानी

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