
ब्रह्म -क्षत्रिय के रूप में विख्यात परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे जो जन्म से ब्राह्मण लेकिन कर्म से क्षत्रिय थे। शास्त्र और शस्त्र दोनों में समान रूप से निपुण परशुराम विष्णुजी के छठे अवतार माने जाते हैं जिनका जन्म आखातीज या अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। माना जाता है कि श्री हनुमान जी की तरह परशुराम भी चिरंजीवी है और महेन्द्रगिरी पर्वत पर तप में लीन है। कल्कि के आने पर उनके गुरु और मार्गदर्शक की भूमिका निर्वहन करेंगे।
ऋषि जमदग्नि पुत्र रामभद्र को भगवान शिव ने प्रसन्न होकर परशु (कुल्हाड़ी) दी जिसे पाकर रामभद्र परशुराम बन गए। उन्होंने परशु को तब-तब अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जब -जबउन्हें सामाजिक व्यवस्था में न्यायसंगत संतुलन की ज़रूरत लगी। सीता स्वयंवर के बाद परशुराम श्रीराम से अत्यधिक क्रोधित थे क्योंकि उन्होंने शिव का धनुष तोड़ा था। क्रोध में उन्होंने चुनौती भी दी थी मगर श्री राम के धीर-गंभीर स्वभाव ने उनके क्रोध को वात्सल्य में बदल दिया। वस्तुतः उन्होंने श्रीराम के भीतर भगवान विष्णु के अंश को पहचान लिया था।
परशुराम का जीवन प्रकृति और वृत्ति के बीच संतुलन की बड़ी मिसाल है। वे वेदों के ज्ञाता, गुरु और ब्राह्मण कुल की संतान थे मगर स्वभाव राजसिक था। कर्ण को शिक्षा दी मगर जब उन्हें कर्ण के जन्म का सत्य पता चला तो उन्होंने उसे श्राप दे दिया। दरअसल सत्य और सामाजिक मर्यादाओं के बीच द्वंद्व कल भी था, आज भी है। यह प्रश्न केवल कर्ण के जीवन के दुखद अंत का आधार का ही नहीं है, यह गुरु-शिष्य परंपरा, सत्य और धर्म के जटिल अंतर्विरोधों को भी दर्शाता है।लेकिन
परशुराम के श्राप को अंतर्विरोध की श्रेणी में डालने से पहले आइए पूरी कहानी बताते हैं आपको..
परशुराम क्षत्रियों के अत्याचार से क्षुब्ध थे इसीलिए उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे सिर्फ ब्राह्मणों को ही विद्या सिखाएंगे। कर्ण महान धनुर्धर बनने का प्रबल इच्छुक था अतएव उसने झूठ का सहारा लिया और ब्राह्मण का स्वांग भरकर परशुराम का शिष्य बन गया।
एक दिन परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे। अचानक एक भृंग ने कर्ण की जांघ में काटना शुरू कर दिया। तीव्र पीड़ा के बावजूद कर्ण ने उस भृंग को नहीं हटाया कि उस के हिलने से गुरु की नींद टूट जाएगी।कर्ण की जांघ से रक्त बहता जा रहा था और जब रक्त बहते-बहते परशुराम तक पहुँचा तो उनकी नींद टूट गई। वे समझ गए कि कर्ण एक क्षत्रिय है क्योंकि इतनी तीव्र वेदना सिर्फ़ एक क्षत्रिय ही सह सकता है।
उन्हें कर्ण को ज्ञान देने का दुख नहीं था, दुख था —उसके द्वारा दिये गये छ्ल का। बस, क्रोध में परशुराम ने श्राप दे दिया कि …
मुझसे विद्या पाने के लिए जिस तरह तुमने अपना परिचय छुपाया, वह विद्या तुम उस समय भूल जाओगे जब तुम्हें उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी।
यहाँ एक कहावत याद आती है कि साध्य ही नहीं साधन भी सही होने चाहिए। कर्ण की अति- महत्वाकांक्षा ने विद्या- प्राप्ति के लिए बहुत बड़े झूठ का सहारा लिया इसलिए उसकी साधना भी अंततः शापित होकर अर्थहीन हो गई।
पौराणिक प्रसंग मिलता है कि परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था लेकिन उनका क्रोध अकारण नहीं था। यह धर्म,न्याय और शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध संघर्ष की कहानी है। लेकिन विनाश ही अंतिम मार्ग नहीं है, प्रेम, शांति और धैर्य से भी समाज को दिशा दी जा सकती है। युद्ध या संहार में जो भी जीते, हार मानवता की ही होती है इसीलिए परशुराम ने अपनी सारी शक्तियां और क्रोध को समेटकर तपस्या में लीन होने का रास्ता अपनाया। वे चिरंजीवी है और कलयुग के अंत तक मौन अवस्था में तप में लीन रहेंगे।लेकिन जब भी अन्याय और अत्याचार बढ़ेगा,शक्ति,धर्म और विवेक फिर जागृत होंगे।
वस्तुतः परशुराम का चरित्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि वे मात्र एक पौराणिक किरदार नहीं बल्कि एक संपूर्ण विचारधारा है जो शास्त्र,शस्त्र,न्याय,मर्यादा,सामाजिक संतुलन,धर्म, ज्ञान,शिक्षा,सामाजिक व्यवस्था,करुणा,कठोरता,सत्याचरण, नैतिकता और दंड..सबको समाहित करके चलती है।जो मानती है कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में यदि ज़रूरत पड़े तो शस्त्र भी उठाना है।
परशुराम का जीवन सिर्फ़ क्रोध का उबाल नहीं, चेतना के विस्तार की भी कहानी है। माना जाता है कि परशुराम ने अपनी कुल्हाड़ी समुद्र में फेंककर उनसे जगह मांगी थी। सचमुच समुद्र पीछे हट गया। यह क्षेत्र पश्चिम घाट और अरब सागर के बीच की वह भौगोलिक पट्टी है जिसे सह्याद्रि श्रृंखला कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में इसे सप्त कोंकण कहा गया है जहाॅं पहाड़ सीधे समुद्र में मिलते हैं। यह क्षेत्र समुद्र से निकाली भूमि जैसा ही लगता है। इसी मार्ग से वैदिक और ब्राह्मणवादी संस्कृति दक्षिण भारत के दुर्गम और घने जंगलों वाले इलाकों में पहुंची और इस तरह उत्तर और दक्षिण में सांस्कृतिक आदान-प्रदान शुरू हो गया। सदियों पूर्व परशुराम द्वारा प्रारंभ सांस्कृतिक प्रवाह को दक्षिण के रामानुजाचार्य और शंकराचार्य आदि के द्वारा शुरू की गई भक्ति-लहर ने मिलकर एक सतरंगी भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप को जन्म दिया।
**मधु माहेश्वरी गुवाहाटी असम




