
शिक्षा पाकर बाँटे जग में, बनता वही विवेकानन्द ।
अँधियारे में दीप जलाये, वही तमस का काटे फंद ।।
शिक्षक ही तो लक्ष्य प्राप्ति की, बतलाता है जग को राह ।
प्यास देखता जिनमें शिक्षक, करे उन्हीं की वह परवाह ।।
ध्यान-मग्न हो करे ग्रहण जो, कौन करें उसको पाबंद ।
शिक्षा पाकर बाँटे जग में, बनता वही विवेकानन्द ।।
नत-मस्तक हों गुरु चरणों में, बने उन्ही का सदा भविष्य ।
स्वतः प्रेरणा पाकर सीखें, एकलव्य के जैसे शिष्य ।।
मन केंद्रित कर लक्ष्य साधते, वही प्राप्त करते मकरंद ।
शिक्षा पाकर बाँटे जग में, बनता वही विवेकानन्द ।।
धरा सिखाती धैर्य रखे हम, सूर्य-चन्द्र से सीखें कर्म ।
कर्म-साधना को गीता में, कृष्ण बताते उत्तम धर्म ।।
मर्यादित लेखन जो करता, वही श्रेष्ठ रचता है छन्द ।
शिक्षा पाकर बाँटे जग में, बनता वही विवेकानन्द ।।
-लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’




