
धरती मां की गोद में, जीवन का हर रंग खिला,
हरियाली की चादर ओढ़े, ये संसार कितना भला।
नदियों की कल-कल ध्वनि में, मधुर सा संगीत बसा,
पर्वत, सागर, वन-उपवन में, प्रकृति का अनुपम नशा।
पर हमने ही काट दिए, उसके सपनों के वो वृक्ष,
स्वार्थ में आकर भूल गए, उसका हर अनमोल पक्ष।
धुआं, प्रदूषण, लालच की आग, सब कुछ जलता जाता है,
मां का आँचल मैला करके, इंसान मुस्कुराता है।
आओ फिर से प्रण ये लें, हरियाली को लौटाएँ,
एक-एक पौधा रोपकर, धरती का श्रृंगार बढ़ाएँ।
नदियाँ साफ़, हवा शुद्ध हो, ऐसा सुंदर कल बनाएं,
पृथ्वी मां के इस उपकार का, हम भी कर्ज चुकाएँ।
ये धरती है जीवन दाता, इसका मान बढ़ाना है,
आने वाली पीढ़ी को भी, स्वर्ग समान बनाना है।
*अविनाश श्रीवास्तव*
*महराजगंज उत्तर प्रदेश*



