
जानवर को जानवर
काट लेता है
जानवर आदमी को भी
चुपके से काट लेता है
जानवरो में कुछ गुण
प्रकृति प्रदत्त होता है।
कुछ आदमी
आदमी को काट डालता है
कुछ आदमी
जानवर से भी बड़ा जानवर है
आदमी भी जानवर काट लेता है
आदमी काटकर खा भी जाता है
जानवर तो जानवर है
आदमी भी यह पदवी पा लेता है
….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज
कविता का भावार्थ…..
कविता का मूल संदेश यह है कि जानवर अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करते हैं—वे दूसरे जानवरों को काटते हैं और कभी-कभी मनुष्य को भी। लेकिन मनुष्य में यह प्रवृत्ति अधिक खतरनाक है: कुछ लोग खुले तौर पर साथी मनुष्य को ‘काट’ देते हैं (यानी धोखा, हिंसा या शोषण से नुकसान पहुँचाते हैं), जबकि कुछ तो जानवरों से भी बड़े ‘जानवर’ साबित होते हैं। मनुष्य जानवरों को भी मारकर खा लेता है, और इस तरह स्वयं को भी उसी पाशविक स्तर पर ला खड़ा करता है।
अंत में कवि व्यंग्य से कहते हैं कि ‘जानवर तो जानवर है’, लेकिन मनुष्य भी उसी ‘पदवी’ को प्राप्त कर लेता है—यानी अपनी उच्चता खोकर पशुता ग्रहण कर लेता है।यह रचना सामाजिक कुरीतियों, मानवीय क्रूरता और नैतिक पतन पर केंद्रित है, जहाँ कवि ‘जय’ अपनी व्यंग्य शैली में समाज को आईना दिखाते हैं। प्रयागराज से जुड़े इस कवि की यह रचना हिंदी साहित्य में सामाजिक चेतना का प्रतीक है।




