साहित्य

दिल्ली दूर बहुत है

साधना मिश्रा विंध्य

टूटे मन के बोझ तले, हर सपना चूर बहुत है, माना दिल्ली दूर बहुत है।
बिखरे संकल्प समेटे चलना, अब यह दौर बहुत है, माना दिल्ली दूर बहुत है।।

जो राह कभी सरलता से हँसकर, बाहें फैलाए मिलती थी,
आज उसी पथ पर हर कदम पर, कठिनाई का शोर बहुत है, माना दिल्ली दूर बहुत है।।

आँखों में विश्वास धुँधलाया, साहस भी मजबूर बहुत है,
भीतर टूटे मन के कारण, आगे बढ़ना दसतूर बहुत है,
फिर भी मन की एक किरण कहती, हार अभी मंज़ूर नहीं है? माना दिल्ली दूर बहुत है।।

जब तक संकल्प फिर न जागे, तब तक सपना चूर नहीं है, माना दिल्ली दूर बहुत है।।

टूटे मन को जोड़कर, संकल्प फिर भरपूर है,
हर ठोकर में सीख है, हर पीड़ा में नूर है,
राह चाहे जितनी कठिन हो, धैर्य धर्म मशहूर बहुत है,
संकल्प की साधना से, दिल्ली पहुँचना ज़रूर है।

अंधियारी रात चाहे कितनी ही लम्बी क्यों न हो,
विश्वास की लौ जले तो, पथ दुर्गम भी सुगम हुआ है,
संघर्ष की विंध्य राह अटल में, भविष्य का दस्तूर यही है,
संकल्प की साधना के साथ, दिल्ली पहुँचना ज़रूर है।।

साधना मिश्रा विंध्य

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