
छल कपट दंभ द्वेष तज,
चलिए हिलमिल साथ।
सूरज पूजन को चलें,
साथ नवायें माथ।
पर्व मकर संक्रांति यह,
उर्जा की है खान।
चम चम चमके सूर्य सम,
माँगे हम वरदान।।
कोई बोले लोहड़ी,
कोई खिचड़ी पर्व।
आयें खुशियाँ बाँटलें,
अपना है यह गर्व।।
सूर्य को आभार कहें,
देते संध्या भोर।
दिनचर्या इससे शुरू,
विकास का है डोर।।
सत्य सनातन धर्म का,
यह पावन उपहार।
प्रेम मुदित हो लीजिए,
धन आनन्द अपार।।
‘सच्चिदानन्द’ श्री कहे,
शुभ हो यह त्योहार।
सारा जग हर्षित रहे,
फले फूल हर द्वार।।
(गोवर्धनसिंह फ़ौदार ‘सच्चिदानन्द’)
पता :मोरिश्यस।




