
भूल जा मुहब्बत की दास्तानों को।
फ़िक्र अब न रही ज़मीं की आसमानों को।
मरीजे़ इश्क़ का इलाज मुमकिन ही नहीं।
कौन समझा सका है कहो इन दीवानों को।
एक मुद्दत हुई तेरी। खै़रो ख़बर। नहीं।
क्या हुआ अब तेरे,जानम उन इरादों को।
ख़ुश्क पत्तों की तरह उड़ता हूँ यहाँ वहाँ।
क्या करूँगा बतां, बता इन आशियानों को।
मैं भी एक। चिराग़ था। रोशन रहा। कभी।
मुश्ताक़- क्या दूँ इल्ज़ाम इन हवाओं को।
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ हरदा मध्य प्रदेश



