साहित्य

नफरत का मंजर

मधु वशिष्ठ

नफरत का बेखौफ मंजर देख रहे हैं संसार के अंदर,
कहां गए सारे धर्म ग्रंथ? यह कैसा है अंतर्द्वंद।
हिंसा की पराकाष्ठा, वध देखो, चहुं ओर मच रहा आतंक,
कहां गए सब समाज सुधारक, कहां गए अहिंसा के प्रचारक?

एक दूजे के पाप को देखें, बदला लेना ही है उनकी पहली पसंद,
भूल चुके क्यों सब क्षमा, दिव्यता और आत्म-संयम।
धीरज को सब छोड़ चुके हैं, मचा रहे सब हैं आतंक,
अब लेखकों को एकजुट होना होगा, प्रेम से पन्ना भरना होगा।

संसार में छाए घोर उन्माद को, प्रकृति प्रेम से समझाना होगा,
नए सिरे से लेखन करके प्रेम का पाठ पढ़ाना होगा।
खुशियां हर मन में छा जाए, अवसाद को सबके भगाना होगा,
नफरत को नफरत की बजाए प्रेम का पाठ पढ़ाना होगा।

शांति स्थापित करने की खातिर सबको अर्जुन सम लड़ जाना होगा,
शांति स्थापित रहे मानव समाज में, इसलिए सभी दैत्यों को मर जाना होगा।
नफरत का यह मंजर बेखौफ आगे बढ़ाने ना पाए,
इसके लिए सभी मानवों को अपने हिस्से का फर्ज निभाना होगा।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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