साहित्य

मन में उमड़ने लगा उत्तरायण

संजय प्रधान

सूर्य भगवान हुए उत्तरायण पूस ने बाजी हारी,
ढलने लगी कोहरे की चादर कलियों ने कर ली तैयारी,
नींद से जागी अभी सृष्टि बीती ठंडी रात पुरानी,
बदल उभरने लगे कैनवस पर ये है प्रभु महिमा सारी।

मन में उमड़ने लगा उत्तरायण देख रही आंखें प्यारी,
मस्तिष्क देने लगा विचार दृश्य लिखने लगी कलम हमारी,
चुपचाप रहता जो कागज उसने शब्दों की मेंहदी रचवाली ली,
सूख उतरी जब मेहंदी तब आई गजब की शब्दावली ।

ऊर्जावान है अभी ये मन तो क्यों न बहूं अभी भावों संग,
भाव ही तो जीवन है भाव में है उमंग,
भाव कृष्ण राधा है भावों में हैं मीरा हर पल,
भावों में बहती है संगीत कला गजब की है तरंग।

देख रहा हूं सोच रहा कैसा सुंदर विधान बनाया,
त्योहारों के बाद त्योहार हर मौसम में जीवन इठलाया,
साहित्यकारो कवियों को भाव लिखने का अवसर दिलवाया,
रचनाधर्मिता ने ही तो प्राणी को गुनगुनाना सिखाया।
संजय प्रधान
देहरादून।

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