साहित्य

कहानी मीठे रिश्ते

सुषमा श्रीवास्तव

“भाभी माँ ”
“ओफ भाभी….! कितना ले जाऊंँगी..बस हो गया” नम्रता ने कहा
“क्या हो गया….कभी-कभी तो आती है….तुम इनकी भाई होती तो आधा हिस्सा लेती कि न लेती”
“पर भाभी ,भैया इतने खर्चे में हैं….आप लोगो का इतना प्यार मिल रहा है ,वही बहुत है मेरे लिये”
प्यारी ननद एक वर्ष बाद आयी थी….सुगना ने उसे बेटी की तरह पाला पोसा था, हालांँकि सुगना  की सास कभी  नही चाहती थी कि बेटी अपनी भाभी के सम्पर्क में रहे पर बेटी अन्विता   व्यवहार से भाभी की बेटी ही बनकर रह गयी थी।
आज एक सप्ताह रहकर बेटी पुनः अपनी ससुराल जा रही थी।
“बहू….! जा किचन में जा, दूध उबाल पर है” सुगना की सास आते ही बोली
“जी, मांँ जी ” कहते हुये सुगना किचन में चली गयी….बहू के किचन में जाते ही सास ने अपनी बेटी को दस हजार रुपये अपनी साड़ी के पल्लू में  से निकाल कर दिया।
“यह क्या मांँ..?”
“रख ले बेटी तेरे काम आयेंगे”।
“पर मांँ, तुझे यह मिले  कहाँ….? आपकी कोई नौकरी तो है नही, अभी भैया को छुटकी के स्कूल की फीस भरनी है….उन्ही को दे दीजिये,अभी उन्हें इसकी ज्यादा ज़रूरत है ।”

“नही बेटी! तुम्हारे पापा मुझे कंगाल छोड़कर नही गये , तू रख ले।”
और जबरन बेटी के हाथ में रुपये धरकर चली गयीं.. ..बेटी अन्विता को पिछले महीने का भाभी का फोन याद आ गया।
भाभी बहुत परेशान थीं…..भैया को सेलरी मिली थी और उसमें से दस हजार रुपये घर में से  गायब हो गए बता रही थीं…..
उसने कुछ सोचा,वह हौले से  मुस्करायी और किचन की तरफ चल पड़ी।

“अच्छा भाभी मैं चलती हूँ और हांँ! यह दस  हजार रुपये अभी सोफे के नीचे मिले, अभी मेरी जूती उसके नीचे चली गयी थी..जूती  तलाशने में यह भी मिले…..शायद यह वही रुपया है जिसके विषय में आपने फोन किया था। ”
सुगना की आँखों में आंँसू आ गए, वह अपनी सास और ननद की बातें सुन चुकी थी….ननद को अपने आगोश  में भर लिया….और धीरे से कहा “तू मेरी सबसे बड़ी बेटी है ”
ननद -भाभी दोनों मुस्करा पड़ीं,सच है जीवन के मीठे रिश्ते बन जाते हैं।

लेखिका-
सुषमा श्रीवास्तव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

 

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