चन्द माह का लेकर अवसर वह,धर्मनिष्ठ काशी धाम को आया।
माँगा उसने आकर धर्म व्यवस्था,यवनी को कैसे जाये अपनाया।।
रक्त शुद्धता और श्रेष्ठता,ही शास्त्रोचित है पालन करना कह कर।
भ्रमित किये ब्राम्हणकुमार को,प्रतिकूल व्यवस्थाअवैदिक देकर।।
साबुन पानी करने से बोलो क्या, गर्दभी है पुनि घोड़ी हो जाती।
नस्ल बदल जाती है क्या उसकी,द्रुति गति,क्या शुद्धी हो जाती।।
ब्रत उपासना अरु पूजा अर्चन कर,विश्वनाथ मंदिर में ठहर कर।
भोलेनाथ से पुनि स्तुतिआराधन कर,कश्मीर चला पाने रहवर।।
कश्मीरी पंडित थे अति विद्वान,जनमानस में मान्य पूज्य महान।
कहीं व्यवस्था दे ना बैठें वे सब,काशी व्यवस्था से हो अनजान।।
काशी के सब पंडित मिलकर,विकट चक्रव्यूह की संरचना कर।
धावक से उन्हें सन्देश भिजवाये,नयी व्यवस्था से वर्जित कर।।
फिर हुआ वही जो कुछ होना है,नियति नटी का नित रोना है।
राह पड़े हर पीत धातु को,कह दोगे क्या कि यह कुंदनसोना है।।
शुद्धिकरण से असहमति पाकर,प्रवंचनापूर्ण छद्म व्यवस्था से।
व्यथित हृदय से निजगृह को लौटा,मंथन करता निज आस्था से।।
तुम निश्चय करके क्या हो लोटे,यह यक्ष प्रश्न होगा हीअभ्यन्तर?
होगा विवाह या कि निकाह,इस गूढ़प्रश्न का मैं क्या दूँगा उत्तर।।
जब राजाज्ञा से राजमहल में,आदेशित होकर वह गया बुलाया।
बतलाओ क्या है अब इच्छा मन की,यह शाही प्रश्न गया दुहराया।। असमंजस तोड़ वो बोला निर्भय,ना होगा निकाह,ना ही विवाह।
धर्म त्याग करने से है अच्छा,जा जंगल में करलूँ अपना निर्वाह ।।
सुन कुपित हो गया बादशाह तब क्रोधित होकर चित्कार किया ।
तुम पाखण्डी अरु दम्भी हो पामर,ना मुराद हो, अपकार किया।।
क्रमशः✍️अकिंचन



