
आजादी के बीत गए हैं,आज अठत्तर साल।
फिर भी हरदम घुटती रहती, हाल हुए बदहाल।।
आजाद कहूँ खुद को कैसे, नहीं सुरक्षित लाज।
जगह-जगह मौजूद दरिंदे,चीर खींचतेआज।।
पंथ अकेले चलना दुष्कर, नजर गडा़ए गिद्ध।
खुल परिहास नहीं कर पाऊँ, पूर्ण रूप से सिद्ध।।
बचपन से ही बँधी हूँ बंधन, नारी का हूँ रूप।
मन कचोट कर रह जाता है, अतृप्तता की धूप।।
धर्म सनातन पालन करके, खुश रखती परिवार।
पर बदले में मिले नहीं वह, जिसकी मैं हकदार।।
कैसे कह दूंँ मैं स्वतंत्र हूँ,पग- पग पर अवरोध।
पुरुष वर्ग से विनय यही है, इस पर करिए शोध।।
जब तक कुदृष्टि पुरुष न बदली,बदले नहीं समाज।
नारी सदा मान की भूखी, नहीं चाहती राज।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




