
समय नदी की धारा जैसा,
सब कुछ अपने संग बहाए,
समय प्रचण्ड तूफ़ान बने जब,
पर्वत भी शीश झुकाए।
समय के चक्र-पटल पर घूमे,
जीवन की हर इक कहानी,
कभी मिटे, कभी रचे युग,
कभी अमर हो जाए निशानी।
जन्म लेते हैं युग-पुरुष तब,
जो गढ़ जाते स्वर्णिम इतिहास,
तेईस जनवरी अठारह सौ सत्तानवे,
जन्मा वह अद्भुत प्रकाश।
बंगाल भूमि, कोडिलिया ग्राम,
सुभाष बने भारत का मान,
रक्त-कणों से लिखी गई गाथा,
जिसका नाम—आजाद हिन्द निशान।
ज्योतिषी ने जन्म क्षण में कहा,
यह होगा वीर चक्रवर्ती,
या होगा त्यागी संन्यासी,
तप से जग को आलोकित करती।
जिसके यश का उजास सदा,
भारत-भू पर दीप जले,
बाल्यकाल से आध्यात्म रुझान,
सादगी में तप-साधना पले।
चौदह वर्ष की आयु में ही,
एक बार गृह त्याग किया,
फिर लौटे, पर लक्ष्य अडिग था,
आत्मबल ने मार्ग दिया।
आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण,
विलायत में मान कमाया,
पर दासता की सेवा से बढ़कर,
देशधर्म को मन ने पाया।
त्यागपत्र देकर कहा उन्होंने—
अत्याचारी शासन न स्वीकार,
जन-सेवा ही जीवन व्रत है,
यही मेरा सच्चा अधिकार।
कई बार बंदी बने कारागार में,
पर सिंह सदा बेखौफ रहे,
इंसान बाँधे जा सकते हैं,
पर तूफ़ान कभी न रोके गए।
काया बाँधी जा सकती है,
पर इरादे नहीं बँधते,
दृढ़ प्रतिज्ञ सेनानी थे वे,
हर बंधन से निकलते, लड़ते।
पारे-से फिसले अंग्रेजी मुट्ठी से,
हर पहरे को चकमा दिया,
बर्मा जा ‘आजाद हिन्द फौज’ रच,
स्वाधीनता का स्वप्न जिया।
जनवरी पैंतालीस का आया क्षण,
उठा प्रश्न—कहाँ गए, कैसे गए?
धूमिल-सी रह गई वह गाथा,
उत्तर आज तलक न मिले।
पर नश्वर देह भले मिट जाए,
विचार अमर बन जाते हैं,
“तुम मुझे खून दो” का नारा,
युग-युग तक गूँज जाते हैं।
हमने तो उनकी जीवित कथा,
आजाद हिन्द फौज में जानी है,
नेताजी केवल इतिहास नहीं,
स्वतंत्रता की अमर कहानी है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




