
माघ की शीतल साँझ ढली,
पंचमी की प्रभात फिर आई।
कुहासे का परदा हटा,
धरती ने पीला चूनर ओढ़ाई।
पलाश के लाल चुनरी में,
अमलतास ने सुगंध घोली।
कोयल ने राग बसंत गाया,
वन-वन में प्राण-पखेरू बोली।
सरस्वती की वीणा से,
झर-झर बहा स्वर-स्रोत नया।
कलम हुई पल्लवित मौन से,
मन के अंकुर में फूटा प्रभात-ज्ञान-छाया।
श्वेत कमल पर विराजमान,
हंसवाहिनी शुभ्र वसना।
पुस्तक-वीणा सृजन धरती,
विद्या-गंगा की अमृत-रसना।
प्रकृति का यह पर्व कहता,
जागो, ज्ञान-दीप जलाओ।
सृजन के पथ पर निर्भय चलो,
अपने भीतर बसंत लाओ।
मिटे अज्ञान के सभी बंधन,
नव चेतना का उत्सव मनाओ।
डॉ अरुणा
राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, जसौर खेड़ी, झज्जर (हरियाणा)




