
महिला सशक्तिकरण का उदय
दुआ मांगती हूँ उस रब से माॅं खुश रहे मेरी
उसकी दुआ से बड़ी कोई दुआ नहीं होती।
जिन्दगी औरत ही औरत को देती है जग में,
पुरुष की जनक भी औरत ही जग में होती ।
मीरा कुब्जा का अमर प्रेम द्वापर से आज भी,
जहर पीकर अमर तलवार से डरी कभी नहीं।
भूखी रहकर भी भरती है अपने बच्चों का पेट,
भीख नहीं मांगती छुपी दया ममता की रीत।
तू पुजारन अकेली नहीं सृष्टि की रचकार है,
वीरांगना भी है तू सृष्टि की पालनहार है।
नारी आगे बढ़ती है अपने बल के पांखो से,
सागर सी गहराई दिल में ममता की छांव से।
नारी सदा आत्मनिर्भर रहकर जीवन जीती है,
वह स्वयं सशक्त है परिचय की नहीं मोहताज हैं।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




