
उल्लू हैं और उल्लू के पट्ठे हैं
देश सारा इनके सदके है।
जो लगा रहे नारे सड़कों पे
थोड़ा गुनाह इनके सर पे है।
रंग दिया एक रंग में दुनिया को
धानी चूनर पड़ी गटर में हैं।
गूंजता है नारों से शहर मेरा
पसरा सन्नाटा मगर जहन में है।
जो चढ़ा बुलडोजर तेरे घर पर
थोड़ी टूटन मेरे घर पर भी है।
मैं बोलूं राम तू बोले अल्लाह
दोनो का घर हमारे मन में हैं।
संजय मृदुल




