साहित्य

विश्व पृथ्वी दिवस

डॉ गीता पांडेय "अपराजिता"

धरती माँ की पीड़ा समझो।
वृक्ष नदी से कभी न उलझो।।

इनसे ही यह जीवन चलता।
सारा जग प्रतिपल है पलता।।

धरती हम सबकी है माता।
फिर भी मनुज कहर क्यों ढाता?

जगह-जगह पर वृक्ष लगाओ।
जल संरक्षण मुहिम चलाओ।।

पृथ्वी में संसार समाया।
श्वेत श्याम रंग इसने पाया।।

सब जन पर्यावरण बचाना।
धरती पर हरियाली लाना।।

उत्सव के पल तब आएंगे।
मिलकर फिर धूम मचाएंगे।।

मांँ वसुधा की करना सेवा।
तभी मिलेगा सच्चा मेवा।।

सदा प्रकृति का मान बढ़ाओ।
वृक्ष लगाकर इसे सजाओ।।

उपकार धरा का है भारी।
जिससे चलती सांस हमारी।।

अन्न हवा जल पानी देती।
बदले में कुछ कभी न लेती।।

मातृभूमि का करती वंदन।
तिलक करूंँ माटी है चंदन।

पृथ्वी दिवस मनाना सच्चा।
संकल्पित हो बच्चा-बच्चा।।

वृक्ष नहीं हम कटने देंगे।
मिलकर रक्षा सभी करेंगे।।

पीड़ा मांँ की सारी खोना।
महकेगा तब कोना-कोना।।

डॉ गीता पांडेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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