साहित्य

लगता कि

रविशंकर शुक्ल

या तो इन नीली आँखों का
सपन अभी तक अनदेखा है
या स्वप्निल जीवन द्वार बीच
खिंची कोई लक्ष्मण रेखा है
मनवा तो आकाश हुआ है
प्रीति पुष्प सा सुघड़ हुआ है
लहकी बासंती उपवन में
नयनों की चितवन रेखा है
कोमल हृदय चाँदनी बन के
खेल रही मन के फुलवारी
मधुरस टपके यूँ होठों से
ज्यों नव शिशु की किलकारी
लगता कि तुमको जीवन के
मधुर पलों में कहीं देखा है।

रविशंकर शुक्ल
८७०७०२००५३

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