साहित्य

मातृभूमे नमन है !

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा" अकिंचन"

नमन वत्सले ! मातृभूमे नमन है,
नमन पितृ भूमे, देवभूमे नमन है !
पयोधि है करता पगों को प्रक्षालित,
नमन हिम किरीटे,शत शत नमन है।।
है तमिस्रा मिटाने की चाहत नमन है,
जुगनुओं की ललक,हौसलों को नमन है।
उजाले की ख़ातिर,जला दे जो तन मन,
स्नेह में हैं पगे,वर्तिका को नमन है।
वज्र छाती हिमालय से गंगा निकाले,
उन भागीरथ भुजाओं को मेरा नमन है।
है अमन चैन पाते परिन्दे चमन में,
खार में भी है खिलते,सुमन को नमन है।
है सींचता खून से जो बगीचे की माटी,
बागवाँ को हैं करतीं, बहारें नमन हैं।
वतन के लिए ही,लुटा दे जो सब कुछ,
आजा़दी के दीवानों ,दीवानगी को नमन है।
बलिदानों की कीमत न चाहा कभी भी,
फिदाये वतन,उन शहीदों को नमन है।
कफन सा लपेटा शहीदों ने जिसको,
मेरी जाँन तिरंगा,शत शत नमन है ।
आचमन के बहाने समन्दर को पीले,
उन अगस्ती इरादों को,मेरा नमन है।
जो अंकित हुआ काल की पट्टिका पर, उस15 अगस्त को,पुनि पुनि नमन है।
जनमन को बाँधा, विधानों से जिसने,
26 जनवरी वरेण्यम् को भी नमन है।
पाश तोड़ा अगस्त पंचमी ने है फिर से,
हे भारत की संसद! तुमको नमन है।
युग -युग से बंदित रही है जो जग में,
हे वीरों की धरती! इन्दु-भूमे नमन है।
है नमन पुण्यभूमे, प्राण-भूमे नमन है,
श्वर्गादपि गरीयसी,माँ!तुमको नमन है।।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा” अकिंचन” गोरखपुर।
चलभाष 9305988252

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