साहित्य

तिरंगे का कफन

प्रिया काम्बोज प्रिया

मुझे जब भी तेरी सेवा का मिले मौका
दिल करता ये दुआ सौभाग्य मेरा होगा
ना हटेंगे पीछे कभी जान की बाजी लगा देंगे
खायेंगे गोली सीने पर हौसला बुलंद होगा
मिट जायेंगे देश ,तिरंगे की खातिर
माटी का ये तन माटी में माटी होगा
कह दो सोच कर कदम बढ़ाये  ज़रा
कदमों में सिर शत्रु का हाथ में तिरंगा होगा
बांध चले हैं तिरंगे का कफन* सर पर हम
कश्मीर से कन्याकुमारी तक लहराता तिरंगा होगा
ये वीरों की धरा है नारी भी जौहर करती है
देश के मान सम्मान को सीमा पर सीमा पर खड़ा प्रहरी होगा

प्रिया काम्बोज प्रिया ✍️ सहारनपुर उत्तर प्रदेश स्वरचित कविता

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