
गणतंत्र सदा अपने जीवन में मनाते रहेंगे।
जीवन अधूरा कर गये नाम हम गाते रहेंगे।।
वीर था सपूत वह माँ को दिलासा देता रहा।
आयेंगे लौटकर माँ तेरी लोरी गुनगुनाते रहेंगे।।
बेटी पूछती पिता से कह कर गये थे आऊंगा।
लौटूंगा क्यूँ तस्वीर पर फूल माला चढ़ाते रहेंगे।।
पत्नी की मांग का सिंदूर क्यों फीका हुआ है।
बेरंग बेचैनी कब तक दुनिया से छुपाते रहेंगे।।
वीरता की गाथा स्वतंत्रता से शुरू हुई थी।
कब तक शहीद तिरंगा में लिपट आते रहेंगे।।
एक निर्णय अब तो कोई स्वतंत्र लीजिए।
माँ बेटी बहनों को दर्द से कब तक तड़पाते रहेंगे।।
बहिन राखी लिए द्वार पर बैठी हुई है उषा।
तिरंगे में भाई येदर्द कब तक चुभाते रहेंगे।।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




