
कुर्सी पर बैठा राजा जब कमजोर हो।
विरोध का स्वर उठ रहा जब पुरजोर हो।।
तब बेचा अपना ईमान जगाना चाहिए।
ऐसे समय में अपनी कुर्सी बचाना चाहिए।।
हर बार कथनी करनी में अन्तर।
जैसे जयचंदो ने बाँध रखा हो जंतर।।
दीन दुखियों की हया क्यों ले रहे।
क्या तुम उनको अपने से कुछ दे रहे।।
अपनी करनी को यही तुम बो रहे।
अपना वजूद तुम खुद ही खो रहे।।
अब तो आंखों से पर्दा हटाना चाहिए।
ऐसे समय में अपनी कुर्सी बचाना चाहिए।।
राजा से कपटी राजा बन बैठे हो।
अपने पैरों की जमीं खन बैठे हो।।
कुछ तो चंद दिनों के मेहमान है।
पूरी दुनियां जाने ये बेईमान है।।
हर दफा ये तुमको भरमाये है।
प्रजा के ऊपर झूठा ही गरमाये है।।
अब तो अंतरात्मा में झांकना चहिए।
ऐसे समय में अपनी कुर्सी बचाना चाहिए।।
सबका समय एक दिन आता है।
इंसान अपने करनी का फल पाता है।।
आज कोई है तो कल कोई होगा।
रचा है जो ईश्वर ने वह सोई होगा।।
आज जिनको रुला रहे कल रोओगे।
अपने नैन खुद से ही खुद खोओगे।।
मजलूमों को घर से निकलना चाहिए।
ऐसे समय में अपनी कुर्सी बचाना चाहिए।।
वक्त की मार से कौन बच पाया है।
झूठी उम्मीदें और झूठी काया है।।
नेक इंसान बनने में कोई बुराई नहीं।
अपनी जेब भरने में कोई भलाई नहीं।।
प्रजा की खुशी में ही राजा खुश होता है।
यहां तो कुछ को ही अपने सर पे ढोता है।।
अब तो इनके खिलाफ आवाज उठाना चाहिए।
ऐसे समय में अपनी कुर्सी बचाना चाहिए।।
जब तुमने रखा किसी का मान नहीं।
तुम पाने के काबिल अब सम्मान नहीं।।
खुद को अब राजा कैसे कहलाओगे।
टूटे मन को फिर कैसे बहलाओगे।।
क्या कोई तीर नई कमान में रखे हो।
मैं कहता रहूंगा तुम जुबां के कच्चे हो।।
सबके दिलों में अग्नि लौ जलाना चाहिए।
ऐसे समय में अपनी कुर्सी बचाना चाहिए।।
डॉ. कृष्ण कान्त मिश्र ‘कृष्ण’
आजमगढ़ उ.प्र.




