
एक आवाज: गुड्डू ओ गुड्डू।
गुड्डू: हाँ कौन?
एक आवाज: गुड्डू! अरे इधर देखो, मेरी बात सुनो।
गुड्डू: जी बोलिये ! लेकिन आप कौन हैं और कहाँ से बोल रहे हैं, और आपकी आवाज में इतना कम्पन क्यों है?
एक आवाज: अरे! क्या मैं तुमको दिख नहीं रहा। तुम्हारे सामने ही तो हूँ। मैं बहुत कष्ट में हूँ इसलिये मेरी आवाज कांप रही है।
गुड्डू अपनी गर्दन अगल बगल व पीछे घुमाकर देखते हुए
गुड्डू: नहीं मुझे तो कोई नहीं दिख रहा और आपको क्या कष्ट है।
एक आवाज: अरे भाई तुम्हारे सामने ही तो खड़ा हूँ। जरा अपनी नजर सड़क से कुछ ऊँची करो। तुम्हारे सामने एक पेड़ दिख रहा है न! मैं वही हूँ।
गुड्डू: हाँ, हाँ! सामने न ? वह जो एक सूखा सा ठूँठ लग रहा है।
पेड़: हाँ हाँ (कराहते हुए), वही जिसे तुम ठूँठ कह रहे हो वही।
गुड्डू: बताइए।
पेड़: मैं ठूँठ नहीं। मैं नीम का पेड़ हूँ, अभी मेरी उम्र ही क्या है मुश्किल से मुश्किल 20 साल। इतनी छोटी उम्र में देखो तुम लोगों ने मेरा क्या हाल बना दिया है।
गुड्डू: मैंने बना दिया है, मतलब, मैंने क्या किया ? मैं तो यहाँ रहता भी नहीं। आज यूँही घूमते घूमते इधर को निकल आया।
पेड़: तुमसे मेरा मतलब व्यक्तिगत नहीं। तुमसे मतलब मानव जाति से। यह देख रहे हो न मेरी एक-एक टहनी में फँसी हुई पॉलिथीन की पन्नियाँ। मेरी शक्ल सूरत कैसी भयानक भूत सी हो गयी है।
इसी तरह पॉलीथिन के मिट्टी में दब जाने से एक अभेद्य परत बन जाती है, जिससे मेरी जड़ों को पानी नहीं पहुँच पाता और मेरे चारों ओर जो मिट्टी है उसकी सांस रुक जाती है (Oxygen circulation बंद हो जाता है)। इसके कारण जो मेरे छोटे छोटे भाई बहन थे साँस घुट जाने के कारण मर गए हैं।
गुड्डू: अच्छा।
पेड़: इसके अलावा प्लास्टिक मिट्टी के कणों से जुड़कर आवश्यक खनिजों और पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेती है, जिससे पौधों को भोजन नहीं मिल पाता और उनका विकास रुक जाता है।
जमीन में दबी प्लास्टिक की थैलियाँ हमारी जड़ों को फैलने के लिए जगह नहीं देतीं। इससे हमारी वृद्धि रुक जाती है जैसे मैं।
गुड्डू: अच्छा यही कारण है तुम बढ़ नहीं पा रहा हो ?
पेड़: हाँ और क्या! प्लास्टिक मिट्टी में घुलकर हानिकारक रसायन छोड़ता है। ये रसायन मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर देते हैं और सीधे तौर पर पौधों को विषाक्त (toxic) बना देते हैं।
खेतों में फेंकी गई प्लास्टिक की पन्नियाँ बीजों के अंकुरण (Germination) को रोकती हैं, जिससे नए पौधे नहीं उग पाते हैं।
गुड्डू: अच्छा, यह तो मुझे नहीं मालूम कह आश्चर्यचकित हो इधर उधर देखने लगता है।
पेड़: इसके साथ ही साथ पॉलीथिन के छोटे टुकड़े (Microplastics) मिट्टी में मिलकर जड़ों द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं, जो पौधों की आंतरिक संरचना को ही नुकसान पहुँचा देते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो पॉलीथिन मिट्टी की उर्वरकता और उसकी प्राकृतिक संरचना को नष्ट कर देता है, जिससे पेड़-पौधे धीरे-धीरे सूखकर मर जाते हैं।
गुड्डू ! मैं भी इसी स्थिति में पहुँच चुका हूँ। न तो मुझे खाने को कुछ मिल रहा है, न पीने को पानी और न साँस लेने को हवा। बस मैं अपनी साँसे गिन रहा हूँ।
तुमने रुक कर मेरी बात सुन ली तो सोचा अपनी व्यथा तुम को सुना दूँ। नहीं तो कौन है जो मेरी सुने।
गुड्डू: पेड़ महाराज यह तो हम लोगों ने आपके ऊपर बहुत अत्याचार कर रखा है। बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ।
पेड़: मैंने तुम्हें अपनी व्यथा व उसके कारण सब बता दिए हैं। तुम कुछ समझदार से लगते हो अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो।
इस संवाद के दो साल बाद।
पेड़: गुड्डू गुड्डू सुनो भाई सुनो।
गुड्डू: अरे पेड़ भाई अब तो आप हरे भरे हो गए हो, पत्तियां भी निकल आयी हैं तुम्हारी।
पेड़: मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूँ जो तुमने न केवल मेरी व्यथा सुनी वरन मेरी भूत जैसी शक्ल को संवारने व मेरे आस-पास की सफाई कर मुझे मरने से बचा लिया। मैं तुम्हारा सदैव तुम्हारा ऋणी रहूँगा।
सुरेशचन्द्र जोशी, उत्तराखंड, पिथौरागढ़।


