साहित्य

ज़िंदगी की सिलवटें

सुमन बिष्ट

ज़िंदगी की सिलवटें

कपड़े पर पड़ी सिलवटें इस्त्री की
गर्माहट से मिट जाती है,
लेकिन ज़िंदगी की सिलवटें
किस इस्त्री के ताप से मिटे?

गर्म इस्त्री के पास
न समय का बोझ होता है,
न स्मृतियों की यादें होती हैं ।
न इम्तिहानों का नतीजा होता है

जीवन की सिलवटें तो हमेशा
अनुभव की तहों में जन्म लेती हैं,
हर मोड़, हर चुप्पी, हर पल,
एक और नई लकीर खींच जाती है।

समय कहता है,मैं ठीक कर दूँगा,
पर वही सबसे गहरी सिलवट छोड़ता है।
सहनशीलता कहती है,मुझे अपना लो,
पर वह भी थककर बैठ जाती है।

ज्ञान भी अपना हाथ बढ़ाता है,
पर उसकी उष्णता सीमित है।
आशा भी क्षणिक मुस्कुराती है,
क्योंकि वह भी तो क्षणभंगुर है।

तब समझ आता है-
कुछ सिलवटें मिटाने के लिए नहीं,
पहचानने के लिए बनी होती हैं।

वे बताती हैं-
कि जीवन इस्त्री किया हुआ नहीं,
वक़्त की सिलवटों के साथ जीना चाहिए।

जैसे अगर जीवन रेखा सीधी है,
तो वो इंसान ईश्वर संग हैं और,
अगर जीवन रेखा में सिलवटें हैं ,
तो वो इन्सान हमारे संग है।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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