
“औरों जैसे होकर भी, बाइज्जत हैं बस्ती में।
कुछ लोगों का सीधा पन है, कुछ अपनी अय्यारी है।
जीवन जीना सहज ना मानो, बहुत बड़ी फनकारी है।”
परमात्मा की बनाई इस सुंदर सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति है- मनुष्य,जो अपने कर्मों से पृथ्वी तल को साक्षात स्वर्ग स्वरूप में परिणित कर सकता है, लेकिन व्यवस्था के षड्यंत्र एवं तंत्र की संवेदनहीनता के कारण आज किस प्रकार आम आदमी घुट घुट कर जीने के लिए विवश कर दिया गया है; इसका जीवन्त दस्तावेज़ है- मैं समय हूं, काव्य संग्रह। श्री दिलीप कुमार पांडेय जी ने इस कृति के माध्यम से एक ऐसे अद्भुत हार की रचना की है जिसमें अलग-अलग सुगंधों वाले विविध किस्म के पुष्प पिरोए गए हैं। हर फ़ूल की सुगंध लेने पर अलग-अलग किस्म के अनुभव पाठकों को सहज ही हो जाते हैं।
वर्तमान युग मानव मात्र के लिए जिस प्रकार की घुटन, पीड़ा, संत्रास एवं अस्तित्व की अभिव्यक्ति के लिए छटपटाहट का वाहक बन गया है; इसका अनुभव श्री दिलीप कुमार पांडेय जैसे संवेदनशील कवि एवं व्यक्तित्व बेहद गहराई से करते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में वर्तमान युग के आम आदमी के संघर्ष का चित्रण सहज एवं यथार्थ रूप में प्रतिबिंबित हो जाता है।
व्यवस्था के यथार्थ की आलोचना अथवा नीर क्षीर विवेकी मूल्यांकन की बजाय व्यक्ति से चुप रहने की अपेक्षा की जाती है। सत्ता द्वारा दिखाए जा रहे अनजान रास्तों पर सिर झुका कर चुपचाप चलते जाना आम आदमी की नियति है। शासन के सर्वोच्च स्तर पर निरंकुश एवं संवेदना शून्य लोगों का कब्जा है। उनके मुंह से निकले हुए शब्द ही कानून और संविधान हैं। आम आदमी को आवाज़ उठाने पर आज भी वही लाठी और गोली खाने को मिलती है। शोषण का स्वरूप पहले से अधिक संगठित एवं संस्थागत हो गया है। धर्म और अध्यात्म भी जन सामान्य के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में अक्षम हो गया है। कवि हैरान है कि उसने ज़िंदगी से क्या अपेक्षाएं की थीं लेकिन उसे वास्तव में मिला क्या है?
पाप ,अन्याय और शोषण अपने चरम पर हैं।आज किसी अवतार के आने एवं व्यवस्था को आमूल चूल रूप से बदल देने की कोई आशा नहीं है। कवि के हाथ में सबसे बड़ा हथियार उसकी कविता है जो हर बंधन से मुक्त होकर अपने मुखरित स्वरूप में यथार्थ का चित्रण करती है। उसे किसी राजनीतिक अथवा सामाजिक दल का आश्रय नहीं चाहिए। जन सामान्य के समक्ष निडर और निर्भीक होकर पाखंड एवं शोषण की पोल खोलना ही उसका धर्म है।
पांडेय जी की इस कृति में साक्षी एवं दृष्टा के रूप में “समय” तत्व उपस्थित है। अपने आप को देश और समाज के नव-निर्माण में खपा देने वाले लोग समय के प्रभावाधीनएक बेहतर राष्ट्र एवं समाज के निर्माण का अपना लक्ष्य एक न एक दिन अवश्य प्राप्त करते हैं। काल के प्रभाव से कोई भी नहीं बच पाता। मनुष्य के अंदर मन और मस्तिष्क के सतत संघर्ष में अहंकार एवं माया प्रभाव दिखाते रहते हैं। सामान्य मनुष्य रोजी-रोटी के लिए मारा मारा फिरता है लेकिन विशेष लोग नाम, पद, शोहरत, दौलत के नशे में चूर रहकर अपने आप को देश और समाज का कर्णधार समझते रहते हैं। दिनकर जी के शब्दों में–
“श्वानों को मिलता दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं।
मां की हड्डी से चिपक ठिठुर,जाड़े की रात बिताते हैं।
युवती के लज्जा वसन बेच, जब ब्याज चुकाए जाते हैं।
मालिक तब तेल फुलेलों पर, पानी सा द्रव्य बहातें हैं।”
प्रकृति के शोषण के भयावह परिणाम भी कवि को चिंतित कर रहे हैं। प्राकृतिक चक्र को बाधित करके मनुष्य किस भयानक भविष्य का सृजन कर रहा है, इसकी उसे अभी कोई चिंता नहीं है! जो कल तक उपेक्षित एवं त्याज्य था, आज उसी को गर्व पूर्वक अपनाकर अपने आप को अंधेरे में रख रहे हैं।
अपनी रचना के सृजन कर्म में डूबा हुआ कवि सोचता है, कि आखिर युद्ध और नरसंहार का सबब क्या है? सत्ता के रचाए खेल में फंसकर मनुष्य एक दूसरे की जान का दुश्मन क्यों बन जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्त संसार में नरसंहार के आधुनिक उपकरणों का अवलंबन करके मानव एवं मानवता का विनाश किया जा रहा है। आज आवश्यकता है कि विश्व बंधुत्व की भावना को पुष्ट किया जाए तथा युद्ध एवं विनाश के बहिष्कार का संकल्प लेकर प्रेम एवं सद्भावना के पुष्प खिलाए जाएं।
जब समय करवट बदलता है तो सामर्थ्यवान भी लाचार होकर संसार की दया का मोहताज बन जाता है। बाहर के संसार में अभिनय करने के बाद भी कवि को अपना मूल घर याद आता है और वह सब कुछ भूल कर अपने घर संसार और अपनी अंतरात्मा का आश्रय चाहता है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में नकारात्मक एवं आपराधिक तत्वों का बोलबाला हो गया है। मूल्य आधारित राजनीति हाशिए पर चली गई है। चारों तरफ़ छाये नैराश्य एवं संवेदना शून्य वातावरण से घबराकर कवि अपनी अन्तश्चेतना का आश्रय लेना चाहता है। बाहर के संसार को त्याग कर भीतर की उज्ज्वल एवं निष्पाप दुनिया में खो जाना चाहता है।
वर्तमान समय के यथार्थ ने कवि के कोमल अंतर्मन को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। वह भूत, भविष्य एवं वर्तमान का यथार्थ चिंतन करते हुए, इस युग के जटिल एवं यांत्रिक स्वरूप का सामना करता है। व्यवस्था के बनाए सुनहरे जाल में फंसकर दम तोड़ते हुए आम आदमी को देखता है। हालातों के चक्रव्यूह में फंसकर कवि का मन इस हद तक पीड़ित होता है कि वह स्वर्णिम अतीत को भुलाकर यथार्थ की कठोर जमीन पर पूरी मजबूती से खड़ा हो जाता है।
संसार में समय लगातार साक्षी एवं दृष्टा भाव से चलता रहता है। हर पल हर क्षण के साथ मनुष्य खर्च होता जाता है किंतु तृष्णा समाप्त नहीं होती। अपनी सृजनात्मकता का आश्रय लेकर कवि अभी भी आशावादी है कि शायद हालातो में कुछ सुधार हो। संसार जीवन जीने लायक बन सके। अंधी और अंतहीन दौड़ समाप्त हो जाए। एक जगह रुक कर यथार्थ एवं सत्य का साक्षात्कार कर लिया जाए।
प्रकृति में निर्माण और विनाश बदस्तूर जारी है। कवि एक क्षण विशेष में जी कर सत्य को जान एवं पा लेना चाहता है। उसकी यात्रा लगातार चलती रहे।कोई अवरोध न हो। एकाग्र भाव से बिना किसी वाद, पार्टी या समूह का आश्रय लिए बिना अपरिवर्तित स्वरूप में,वह लगातार चलते चले जाना चाहता है, क्षितिज के उस पार तक, जहां शायद उसे निज अस्तित्व की सार्थकता का भान हो जाए।
यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर सत्य का निर्मम साक्षात्कार करते हुए रचे गए इस काव्य संग्रह में काल के निरंतर प्रवाह,आम आदमी के शोषण एवं जिजीविषा, व्यवस्था के रचे हुए चक्रव्यूह का भयानक प्रभाव, सत्ता एवं प्रशासन की संवेदनहीनता, जन सामान्य का रोजमर्रा का जीवन संघर्ष, आदमी के अंतर्मन में बसा अंधेरा, कवि का विद्रोह एवं विवशता, दैनिक जीवन में पैर पसार चुकी यांत्रिकता एवं मूल्य हीनता तथा चरम नैराश्य एवं घोर अंधकार के बीच भी अपनी चेतना को जागृत रखते हुए सतत एवं अंतहीन संघर्ष के लिए तत्पर कवि मन के सहज प्रतिबिंब दृष्टिगोचर होते हैं।
श्री दिलीप कुमार पांडेय जी आशावादी एवं यथार्थ के धरातल पर खड़े रहकर संघर्ष के पक्षधर व्यक्तित्व हैं। हालात चाहे कितने ही बदतर हों, व्यवस्था और तंत्र अपनी चक्की में आम आदमी को पीसकर चूरा बनाने पर तत्पर हों, लेकिन कवि प्रेम एवं सद्भावना का मार्ग भी खुला रखता है। वर्तमान संसार में हो रहे हर घटनाक्रम का साक्षी समय है तथा कवि को विश्वास है कि हालातों में बदलाव अवश्य होगा।
इस काव्य संग्रह में समाहित 68 छोटी बड़ी कविताएं वर्तमान समय का जीवंत दस्तावेज़ हैं। भाषा शैली सरल, सहज, सुबोध एवं अंतर्मन को स्पर्श करने वाली है। कृति के आद्योपांत पठन के अंत में पाठकों के समक्ष यदि कुछ रह जाता है, तो वह है गहन चिंतन ,मनन और विश्लेषण;ताकि एक बेहतर समाज एवं राष्ट्र का निर्माण करने के लिए व्यक्ति की प्रतिबद्धता सुनिश्चित की जा सके। हर कविता अपने आप में एक मशाल की तरह जलकर आम आदमी का पथ प्रशस्त करती है और उसे संघर्ष एवं जिजीविषा से आप्लावित कर देती है।
एक बेहतरीन काव्य संग्रह के सृजन के लिए श्री दिलीप कुमार पांडेय जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।




