
सताए वो हमें हरपल, निगाहों से सदा तोड़े ।
बड़ी कातिल नजर उनकी, अदाओं से सदा तोड़े ।।
मिले दीदार जो उनका, झलक भर भी तमन्ना है,
झरोखे से जरा देखूं कलाओं से सदा तोड़े ।।
शमा बन के जला करते सुहानी रात यूं बीते,
कहूं मैं चांद या शोला, खयालों से सदा तोड़े ।।
सजा महफिल यहां बैठे न परवाने जला करते,
नजर से वार करते हैं वफाओं से सदा तोड़े ।।
लगा कर इत्र चले हिरणी, कटारी से कतल होते,
चमन में जो घुली खुशबू फिजाओं से सदा तोड़े ।
लगी दिल की बुझाने को रुहानी खत लिखा करते,
वफ़ा नीलम तड़प दिल की दुआओं से सदा तोड़े ।।
नीलम अग्रवाल रत्न बैंगलोर
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