
ये जो दमकती कलम है सखी हमारी,
सांवली सूरत है इसकी बड़ी प्यारी,
अदब शराफत संग है इसकी अदाकारी,
सर झुका कर खूब लिखती बातें प्यारी।
संग साथी बने जब इसके गणेश भगवान,
तब हुआ भागवत पुराण का आहृवान,
बने जब साथी महा कवि तुलसी भगवान,
मन से लिख दी गई श्रद्धेय रामायण पुराण।
मिलते ही कविवर रसखान बिहारी,
रस ही रस लिखती गई बारी बारी,
मिली इसे भी आजादी आन्दोलन की जिम्मेदारी,
तब आत्मविश्वास बहादुरी से निभाई इसने भागीदारी।
पड़ गए इसके तन मन पर गर्म फफोले,
आजादी के अनेकों दीवाने जब फांसी झूले,
डेथ वारंट पर भारी मन से आंसू लिखे होंगें,
रातों रातों जब भरी सिसकियां होंगी इसने अकेले।
मिली आजादी लहराया लाल किले पर तिरंगा,
जोशीले राष्ट्रीय गान की बही अमर गंगा,
जश्न से रंग गया होगा हर अखबार का पन्ना,
इसके मन का हर कोना भी हुआ होगा चंगा।
अभी भी है इसके पास रास रंग और धड़कन,
कागज के सीने पर मचाती है ये थिरकन,
पढ़ो जरा महसूस करो सुंदर चंदन वन,
देखो कागज के आइने पर झूमता नव गगन।
संजय प्रधान
देहरादून




