
रस-चंद बसंत नेराने सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।
चंदा लरजि के बहोरे अगनवाँ,
मंद मंद महके ला हमरा भवनवाँ,
लागे नैनन से नैन अरुझानें सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।
बरबस लिपट जाले लिलरा से बिंदिया,
आधीआधी रतियाँ चिहुँकि जाले निदिया,
हमका मस्त मदन भरमाने सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।
कलियन के पँखुरी पे नाचे नजरिया,
कयिसे क धीर धरिहें बिरही गुजरिया,
‘लाल’ चहुदिशि कंत लखाने सखी।
मोरा मनवाँ कहनवाँ न माने।।
*रचना-@लालबहादुर चौरसिया “लाल”*
गोपालगंज, आजमगढ़




