
योग्यता को दंड बनाकर,
काबिल का हक़ मिटाओगे?
मेधा का अपमान करके,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
चयन में जब न्याय नहीं,
भविष्य कैसे बचाओगे?
नींव ही जब खोखली होगी,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
मेधा को दरकिनार कर,
औसत को सिर चढ़ाओगे?
प्रतिभा रोएगी चुपचाप,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
नीति नहीं जब नीयत में,
शासक क्या कहलाओगे?
सत्ता के मद में अंधे होकर,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
संविधान की ओट लेकर,
भेद की दीवार उठाओगे?
न्याय को छलनी करके तुम,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
शिक्षा को राजनीति बना,
राष्ट्र कैसे बनाओगे?
ज्ञान नहीं जब लक्ष्य होगा,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
मेहनत रोए, पद बँटे,
इंसाफ़ कब समझाओगे?
हक़ का गला घोंट कर तुम,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
समानता का पाठ पढ़ाकर,
खुद ही क्यों भटकाओगे?
दोहरी नीति की राह पकड़,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
आज सवाल, कल इतिहास,
क्या उत्तर दे पाओगे?
समय के कटघरे में खड़े हो,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
अभी भी वक्त है चेत जाओ,
वरना जवाब चुकाओगे।
जन–जन के इस प्रश्न से तुम,
आखिर देश कहाँ ले जाओगे?
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल, उत्तर प्रदेश




