साहित्य

ग़ज़ल

वाई.वेद प्रकाश

सुख लगता जैसे जीवन की मुस्कानों का गहना है
दुःख आये जीवन में तो जीवन का क्या कहना है।
निशि दिन चलता है संघर्ष मनुज का जीने की प्रत्याशा में,
कोई माने या ना माने इस पर क्या कुछ कहना है
एक नई अभिलाषा प्रतिक्षण याद दिलाती रहती है
यादें हैं यादों का दर्पण चेहरे का क्या कहना है।
एक अनोखी कोशिश अपनी यहां -वहां न खोने दें
भटक रहे जंगल -जंगल इस जंगल में रहना है।
ऊंच – नीच वाली दुनिया में संकट पर संकट आते हैं,
सुख-दुख आते जाते हैं पर हमको सब कुछ सहना है।
ढहते हुए कगारों पर हो खड़े देखना जीवन को,
बहती जाती एक नदी संग मुझको भी तो बहना है।

वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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