
धन्य हुई तू जनकनंदिनी,
धन्य तेरी वह कृति रही।
धन्य हुई मिथिला की माटी,
धन्य तेरी संस्कृति रही।।
टल न सकी विधि की लेखनी,
सतीत्व सत्य तेरी रीति रही।
दो कुलों की राखी लाज जो,
मिथिलेश कुमारी सीता रही।।
सूर्यवंश के सूर्य किरण की,
आभा बनकर बिखरी थी।
मिथिला की वह जनकनंदिनी,
राम-सिया संग निखरी थी।।
स्वयं कष्ट सहकर सिया ने,
दूसरों को सम्मान दे गई।
कुल की मर्यादा रखकर,
सती नारी की पहचान दे गई।।
सीता जैसी आज वह नारी,
नहीं कहीं अब दिखती है।
धन्य हैं मिथिला के सभी जन,
जहां आज भी सीता पुजती है।।
मुन्ना प्रसाद
शिक्षक सह कवि
रोहतास बिहार




