
राहें चाहे कठिन हों, पथरीली हो डगर,
भीतर हौसलों की लौ जलती रहे निरंतर।
आंधियाँ लाख रोकें मेरे बढ़ते कदम,
रुकना नहीं सीखा — यही मेरी पहचान है।
गिरूँ अगर तो फिर संभलना भी आता है,
हर चोट जीवन का पाठ पढ़ाता है।
ठोकरें राह की दुश्मन नहीं होतीं,
वो ही भीतर की छुपी ताकत जगाती हैं।
काँटे बिछाने वाले मिलते हैं सफ़र में,
पर दुआओं की छाँव भी रहती है नज़र में।
नकारात्मकता की धूल उड़ती रहे चाहे,
उम्मीद का सूरज फिर भी उगता ही जाए।
यह जीवन क्षणभंगुर — ठहरता कहाँ है?
हर पल नदी सा बहता यहाँ है।
इस छोटी सी उम्र में कुछ ऐसा कर जाऊँ,
कि अपने होने का अर्थ खुद जान पाऊँ।
वरना क्या फ़र्क रह जाएगा फिर
मेरे अस्तित्व में और उस सूने अधीर
सूखे पेड़ पर झूलते खाली घोंसले में,
जहाँ कभी चहक थी — अब बस सन्नाटे हैं।
नहीं…
मैं यूँ ही नहीं गुजरूँगा समय की धारा में,
अपनी छाप छोड़ जाऊँगा इस जग सारा में।
जब तक साँस है, प्रयास रहेगा,
हौसलों की लौ से हर अँधेरा पिघलेगा। 🔥
“रंजीता निनामा, झाबुआ (म.प्र.)”




