
वह मनुष्य किसी काम का नहीं,
जिसमें मानवता का अंश मात्र ना हो।
मानव सृष्टि की अनुपम कृति है,
संवेदना हो घृणा का पात्र ना हो।
जाति भेद और भेदभाव ना हो जिसमें,
दिल से करुणा की गंगा बहती रहे।
सबके दिलों का दर्द वह समझे,
उसकी भाषा दिलों को सुकून देती रहे।
सच्चा मानव वह है धरा पर जिसको,
सब खुले मन से गले लगाकर रखें।
सब अपनी जिंदगी की परेशानियों को,
बिना झिझक उसे बताकर रखें।
मानव जन्म लिया है तुमने तो,
अच्छे कर्म कर उसे सार्थक बनाना,
अपनी सारी जिम्मेदारियां को निभाकर,
हर दिल में मानवता का दीप जलाना।
सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र।




