
पुस्तकें ,
ये केवल ढेरों पन्नों का ढेर नहीं हैं,
ये मन की बुझी लौ को रोशन करती हैं।
अक्षरों के बीच छिपा होता है जीवन का सार,
जो सोच का असीमित विस्तार करती हैं।
पुस्तकें,
हर दिशा में ज्ञान के दीप जलाती हैं,
अज्ञान के अंधेरों को चुपचाप हटाती हैं।
हर विषय, हर अनुभव, हर सच को
मन की गहराई तक उतार लाती हैं।
पुस्तकें,
हमें खुद के व्यक्तित्व से मिलाती हैं,
कमज़ोरियों से आँख मिलाना सिखाती हैं।
व्यक्तित्व के कच्चे पक्के रंगों को,
धीरे-धीरे से सँवारकर निखारती हैं।
पुस्तकें,
दूसरों के दुख को समझना सिखाती हैं,
उनकी नज़र से दुनिया देखना सिखाती हैं।
इंसानियत के कोमल भावों के साथ,
हमें बेहतर,अच्छा इंसान बनाती हैं।
पुस्तकें ,
चिंताओं के शोर को मौन करती हैं।
थके हुए मन को शांति व आराम देती हैं,
एकांत में भी हमेशा साथ निभाकर,
स्वस्थ मानसिकता को संबल देती हैं।
पुस्तकें ,
हमारी कल्पनाओं को पंख लगाती हैं,
नए विचारों की ऊँची उड़ान भराती हैं।
जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाकर,
हमें हर दिन थोड़ा और बेहतर बनाती हैं।
सुमन बिष्ट, नोएडा




