साहित्य

इल्तिजा

राजीव त्रिपाठी

तुम्हारा ज़िक्र आते ही कहानी में
सारे किरदार आंँखों में तैरने लगते हैं!!
हमने तो ग़लती से तुझे चाहा था
ना-हक़ ही हम बदनाम होने लगते हैं!!
वफ़ा के बदले बेवफ़ाई मिलती है
हम तेरे तसव्वुर को भी तरसते हैं!!
निगाहें फेर ली क्यों तुमने जाते-जाते
हम तो बे-जान से रोज़ लड़ते हैं!!
तेरी तस्वीर में जितने भी रंग हैं
मुझको मेरे लहू से लगते हैं!!
अब तो ख़ामोश रह नहीं सकते
पानी हमारे सर से रोज़ गुज़रते हैं!!
बेख़्याली में ले लेते हैं इश्क़ का नाम
हम कहांँ आपका ज़िक्र करते हैं!!
हमें तो जीना भी दुश्वार लगता है
आप किसे जीने की सज़ा करते हैं!!
इतना तरस तो ज़िन्दगी ने नहीं खाया
आप क्यों मेरी परवाह करते हैं!!
होगा मंज़ूर तो मर भी जाएंगे
ख़ुदा से भी यही इल्तिजा करते हैं…

– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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